देवताओं से कम लोलुप
राक्षसों से कम आततायी
धूप-धूल-धुएँ से सना
अधूरी इच्छाओं का शिकायती दस्तावेज
जो कि मैं हूँ -
सखेद सूचना की मजबूरी-सा
समय के बोर्ड पर टँगा
जो कि मैं हूँ -
अपने जीवन की कहानी का नायक ढूँढ़ता एक्स्ट्रा
कृपया मुझसे किसी के घर का पता न पूछें
यह शहर मेरा है पर नया हूँ मैं यहाँ
मेरे लिए सब रास्ते अजनबी हैं
जहाँ लोग एक पंक्ति के अँधेरे से
दूसरे अँधेरे में प्रवेश कर रहे हैं
इस अजनबी शहर में
या तो लोग सपनों के तले दबे पड़े हैं
या सपने लोगों तले।
मुझसे मेरी कविता का अर्थ भी न पूछो
जहाँ अक्सर वही गुना जाता है कई गुना
जो कहा नहीं गया कभी
वहाँ सिर्फ भाषा में उकेरी गयी बेहोशी है
मैं सिर्फ अपने दर्द को जानता हूँ और चूँकि
भाषा के बाहर उनके मामूली हो जाने का डर है
इसलिए उसे कविता के पिटारे में रखा है
और पीड़ा का दिव्य चोला धारण किया है।
मुझे अपनी आवाज प्राचीन समय की नाल से आती सुनाई देती है
इसीलिए मैं अपनी जबान को
किसी और के मुँह में रखता हूँ
और अभिव्यक्ति की आजादी का लुत्फ उठाता हूँ।
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Monday, February 7, 2011
Thursday, July 22, 2010
परमेन्द्र सिंह की कविताएँ

मेरा दुःख
मेरा दुख मिटा नहीं
खो गया - अख़बार की ख़ूनी ख़बरों में
उबलती नदियों पर जमी बर्फ़ में
मेरा दुःख मिटा नहीं
कट गया - बच्चों की दूधिया हँसी से
किसान की दराँती से
मेरा दुःख मिटा नहीं
बदल गया - विज्ञापन में और बिक गया।
लगभग जीवन
अधिकांश लोग जी रहे हैं
तीखा जीवन
लगभग व्यंग्य
अधिकांश बँट गए से बचे
लगभग जीवन में
अधिकांश पर बैठी मृत्यु
लगभग स्वतंत्र अधिकांश लोगों में
स्वतंत्र होने की चाह
स्वतंत्रता के बाद भी
लगभग नागरिकों की अधिकांशतः श्रेष्ठ नागरिकता
लोकतंत्र का लगभग निर्माण कर चुकी है
अधिकांश लोग लगभग संतुष्ट हैं
शेष अधिकांश से लगभग अधिक हैं।
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