Monday, August 2, 2010

व्योमेश शुक्ल को बधाई


नयी पीढ़ी की बुलंद आवाज़ के प्रतिनिधि कवि व्योमेश शुक्ल को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया हैउनको शब्द-शक्ति की और से हार्दिक बधाईइस अवसर पर विष्णु खरे की इन पंक्तियों के साथ उनकी दो कविताएं प्रस्तुत है -
‘‘जब आपका मुक़ाबला व्योमेश शुक्ल जैसे प्रतिभावान युवा हिन्दी कवि से होता है तो आप सिर्फ उसे समझने के लिए नहीं,स्वयं अपना दिमाग साफ करने के लिए भी एक पहला उपक्रम तो यह करते हैं कि उसे और उस जैसे अन्य युवा हिन्दी कवियों को किस परम्परा के परिप्रेक्ष्य में देखना शुरू किया जाए। प्रारम्भ में ही ऋग्वेद और महाभारत की काव्य-प्रवृत्तियाँ याद आती हैं जो कबीर, रहीम, रसखान, मीर, नज़ीर, ग़ालिब, हरऔध, छायावादी चतुमूर्ति-विशेषतः निराला,मुक्तिबोध,शमशेर,नागार्जुन,त्रिलोचन,भवानी प्रसाद मिश्र से होती हुई हमें रघुवीर सहाय तक पहुँचाती हैं,लेकिन एकदम सूसामयिक संदर्भ में हमें व्योमेश शुक्ल जैसे 21 वीं सदी के पहले दशक के युवा हिन्दी कवि मुख्यतः मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के अपेक्षाकृत बड़े सिलसिले या प्रबलतर धारा के हरावल में दिखाई से देते हैं।’’
-विष्णुखरे
चौदह भाई बहन
झेंप से पहले परिचय की याद उसी दिन की
कुछ लोग मुझसे पूछे तुम कितने भई बहन हो
मैंने कभी गिना नहीं था गिनने लगा
अन्नू दीदी मीनू दीदी भानू भैया नीतू दीदी
आशू भैया मानू भैया चीनू दीदी
बचानू गोल्टी सुग्गू मज्जन
पिण्टू छोटू टोनी
तब इतने ही थे
मैं छोटा बोला चौदह
वे हँसे जान गये ममेरों मौसेरों को सगा मानने की मेरी निर्दोष गलती
इस तरह मुझे बताई गई
माँ के गर्भ और पिता के वीर्य की अनिवार्यता
और सगेपन की रूढ़ि

बूथ पर लड़ना
पोलिंग बूथ पर कई चीज़ों का मतलब बिल्कुल साफ़
जैसे साम्प्रदायिकता माने कमल का फूल
और साम्प्रदायिकता-विरोध यानी संघी कैडेटों को फर्जी वोट डालने से रोकना
भाजपा का प्रत्याशी
सभी चुनाव कर्मचारियों
और दूसरी पार्टी के पोलिंग एजेंटों को भी, मान लीजिये कि आर्थिक विकास के तौर पर एक समृद्ध
नाश्ता कराता है
इस तरह बूथ का पूरा परिवेश आगामी अन्याय के प्रति भी कृतज्ञ
ऐसे में, प्रतिबद्धता के मायने हैं नाश्ता लेने से मना करना

हालाँकि कुछ खब्ती प्रतिबद्ध चुनाव पहले की सरगर्मी में
घर-घर पर्चियां बांटते हुए हाथ में वोटर लिस्ट लिए
संभावित फर्जी वोट तोड़ते हुए भी देखे जाते हैं
एक परफेक्ट होमवर्क करके आए हुए पहरुए
संदिग्ध नामों पर वोट डालने आए हुओं पर शक करते हैं

संसार के हर कोने में इन निर्भीकों की जान को खतरा है
इनसे चिढ़ते हैं दूसरी पार्टियों के लोग
अंततः अपनी पार्टी वाले भी इनसे चिढ़ने लगते हैं
ये पिछले कई चुनावों से यही काम कर रहे होते हैं
और आगामी चुनावों तक करते रहते हैं
ऐसे सभी प्रतिबद्ध बूढ़े होते हुए हैं
और इनका आने वाला वक्त खासा मुश्किल है

अब साम्प्रदायिक बीस-बीस के जत्थों में बूथ पर पहुँचने लगे हैं
और खुलेआम सैफुनिया सईदा फुन्नन मियाँ जुम्मन शेख अमीना और हामिद के नाम पर वोट डालते हैं
इन्हें मना करना कठिन समझाना असंभव रोकने पर पिटना तय

इनके चलने पर हमेशा धूल उड़ती है
ये हमेशा जवान होते हैं कुचलते हुए आते हैं
गालियाँ वाक्य विन्यास तय करती हैं चेहरे पर विजय की विकृति
सृष्टि में कहीं भी इनके होने के एहसास से प्रत्येक को डर लगता है

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के अंतराल में
आजकल
फिर भी कुछ लोग इनसे लड़ने की तरकीबें सोच रहे हैं

6 comments:

  1. बेजोड़ रचनाएँ हैं...शुक्ल जी को बहुत बहुत बधाई...

    नीरज

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  2. शुक्‍लजी को facebook पर तो बधाई दी ही है.. यहां पर भी ढेरों बधाई....

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  3. बहुत उम्दा!! चौदह भाई बहन...झंकझोर दिया.

    शुक्ल जी को बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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  4. शुक्ल जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ

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  5. rachnao me dumm hai..........khubsurat prastuti....:)

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